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एक नया मेहमान story telling in hindi

स्कूल की बस ट्रैफ़िक सिग्नल पर खड़ी थी और छह साल का आयुष समझो ड्राइवर भैया के सर पे। गर्मी का दिन था, एक हाथ में लाल रंग की वाटर बोतल और दूसरे में सफ़ेद रंग का टिफिन बॉक्स, पीछे स्कूल बैग, सफ़ेद पैंट से बाहर निकली सफ़ेद शर्ट, बाल बिखरे हुए लेकिन आंखों में चमक।

उसने कहा, “ड्राइवर भैया जल्दी चलो न।” ड्राइवर ने आयुष की ओर देखा और मुस्कुरा दिया। बच्चा पिछले आधे घंटे में चार बार ये बात कह चुका था। ड्राइवर ने कहा, “कार्टून फिल्म मिस हुई जा रही है क्या?”

आयुष ने बड़ी गंभीरता से ना का इशारा किया। ड्राइवर ने फिर पूछा, “शू शू आई है क्या?” आयुष ने फिर कहा ना। ड्राइवर ने कहा, “भूख लगी, हां?” आयुष ने कहा ना।

“फिर ऐसी क्या इमरजेंसी है भैया,” ड्राइवर ने कहा। ट्रैफ़िक सिग्नल हरा हुआ गाड़ी चल पड़ी, दस मिनट में आयुष का बस स्टॉप आ गया। रोज़ की तरह आया उसे लेने के लिए पहुंची हुई थी।

वो घर की ओर चले, तो आयुष इतनी तेज़ी से आगे चलने लगा की जैसे पता नहीं क्या इमरजेंसी आ गई। पांच मिनट में वो दौड़ता हांफता अपने थर्ड फ़्लोर के फ़्लैट की सीढ़ियों पर था।

घंटी बजाई, लगातार कई बार बजाने लगा। उसकी इस आदत से उसके पापा बड़े परेशान रहते थे। रोज़ कहते थे ऑर्केस्ट्रा पार्टी में हो जो यहां कीबोर्ड बजा रहे हो? उसकी मां रागिनी ने दरवाज़ा खोला। सात महीने से प्रेगनंट थीं।

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आयुष ने बैग सोफ़े पर डाला, टिफ़िन बॉक्स और पानी की बोतल अच्छे बच्चे की तरह किचन में रखी और टाई गंदे बच्चे की तरह सोफ़े पर फेंक दी। फिर मां से लिपट गया। बोला, “बताओ न? तुम्हारे कारण में कितनी जल्दी आया स्कूल से। बताओ न मम्मी।”

रागिनी ने कहा, “अच्छा अच्छा आराम से, तुझे बताया न आजकल मम्मा से ज़्यादा चिपकना नहीं है।” रागिनी सोफ़े पर बैठ गई और बग़ल की मेज़ पर रखे बड़े से लिफ़ाफ़े से मेडिकल रिपोर्ट्स निकालने लगी। “ये देख डॉक्टर अंकल ने ये दिया,” रागिनी ने कहा और आयुष की छोटी-छोटी उंगलियों को अपनी सोनोग्राफ़ी रिपोर्ट पर बनी एक सफ़ेद आकृती के ऊपर फ़िराने लगी।

आयुष को तो जैसे किसी ख़ज़ाने की झलक मिल गई। उसने कहा, “कब, कब।” रागिनी ने कहा, “दो महीने बाद, पांच जुलाई को।” आयुष उठा, अपने हाथ फैलाए और पूरे घर में ऐरोप्लेन बनकर मंडराने लगा और ज़ोर-ज़ोर से गाता जा रहा था, “मेरे घर एक काका आने वाला है। रागिनी और उसके पति मोहित के घर में दूसरा बच्चा आने वाला था।

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वक़्त का जोड़ घटाना, गणित करके उन्होंने शादी के एक महीने बाद, जो आने वाली ज़िंदगी का कैलेंडर बनाया था, उसका हर पन्ना प्लान के मुताबिक पलटता जा रहा था। दो साल मैं पहला बच्चा, जब वह छह-सात साल का हो तो दूसरा बच्चा, दोनों के लिए अलग-अलग फ़िक्स्ड डिपोज़िट्स।

आयुष की अच्छी परवरिश हो इसके लिए रागिनी ने अपनी बैंक की नौकरी छोड़ दी थी और कई साल से मां होने की नौकरी, जो अपने आपमें फ़ुल टाइम जॉब होती है, बख़ूबी संभाल रही थी। मोहित एक अच्छी पोजीशन पर था, अच्छी-खासी तनख़ा मिलती थी।

साल में एक बार पति-पत्नी कहीं न कहीं छुट्टी पर ज़रूर चले जाते थे। और इस बार भी गर्मियों में किसी अच्छे हिल स्टेशन जाने की प्लानिंग चल ही रही थी कि डॉक्टर ने सख़्त हिदायत दी की रागिनी ट्रैवल नहीं कर सकती।

अगले ही दिन मोहित ने रागिनी की मां को याद शहर फ़ोन लगाया और कहा, “मम्मी डॉक्टर ने तो रागिनी को कहा की वो कहीं आ जा नहीं सकती, तो हमने अपनी छुट्टी भी कैंसिल कर दी है और उसके बाद लक्ष्मी की शादी में याद शहर भी नहीं आ पाएंगे। लक्ष्मी को समझा दीजिएगा।

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आप ऐसा करिए शादी के फ़ौरन बाद आप यहां रागिनी के पास आ जाइए। हां पापा से कहिएगा 2-2 पेटी लीची और आम ज़रूर पैक करवा दें। ये आयुष को खाने को नहीं मिले न तो वो मुझे खा जाएगा।” रागिनी की मम्मी ने कहा, “ठीक है और वैसे भी अब तो गोद भराई भी होने वाली है।”

मोहित कोशिश करता था रागिनी को ख़ुश मिजाज़ रखे। अपने दफ़्तर की फ़ाइलें और स्ट्रेस वो घर वापस न लाए। दोनों साथ में पुरानी पिक्चरों के गाने सुनते थे।

ड्रॉइंगरूम में अपने लाल सोफ़े पर बैठकर नई पिक्चरों के गानों पर अपने माइकल जैक्सन बेटे आयुष का डांस देखते थे और कॉमेडी फ़िल्मों पर साथ हंसते थे।

बच्चों के नामों की किताब ख़रीदी जा चुकी थी। बच्चों के नाम पर रोज़ छेड़छाड़ के झगड़े होने लगे थे। मोहित हर छोटी-छोटी चीज़ के लिए रागिनी का ख़्याल रखता था। दफ़्तर से फ़ोन करके ख़ैरियत पूछता था। बॉस से बहाने बनाकर जल्दी सरक लेता था।

ऐसा लगता था की इस बच्चे ने अपना जादू दुनिया में आने के पहले ही चलाना शुरू कर दिया था। ज़िंदगी की दौड़-भाग में मसरूफ़ हो चुके मोहित और रागिनी फिर से वही पुराने प्रेमी बनते जा रहे थे।

रेलवे स्टेशन पर गाड़ी आने में बीस मिनट की देर थी। स्कूल की छुट्टियों का वक़्त था और प्लेटफ़ार्म पर बैठने तक की जगह नहीं थी।

वैसे मोहित अगर बैठना चाहता भी तो आयुष उसे बैठने नहीं देता, वो रेलवे स्टेशन होश संभालने के बाद पहली बार आया था। बहुत ख़ुश था। उसकी नानी जो आ रही थी।

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मोहित ने रागिनी की मम्मी से कहा था की वो फ़्लाइट के टिकट भेज रहा था। पर आप तो जानते ही हैं की इन सब मामलों में मां-बाप बच्चों की सुनते ही कहां हैं।

ट्रेन आई नानी उतरीं और आयुष तो प्लेटफ़ार्म पर ही चालू हो गया। हाथ फैलाकर, हवाई जहाज बनकर गाए जा रहा था, “मेरे घर एक काका आने वाला है।” रास्ते भर नानी से आने वाले बच्चे के बारे में बात करता रहा।

ऐसा लग रहा था की बच्चे की आने की ख़ुशी मां-बाप से ज़्यादा आयुष को थी। वो तो इसके इलावा कुछ बात ही करने को तैयार नहीं था। जो उसके घर आता, उससे आयुष अपना फे़वरेट डिस्कशन शुरू कर देता था। और मौक़ा मिलते ही अंदर के कमरे से काग़ज़ों का ढेर ले आता था, जिसमें उसने कई सारी ड्रॉइंग बनाई थीं।

असल में आयुष ने अपने मां-बाप से कह रखा था की वो आने वाले बेबी का चेहरा गेस करके रोज़ एक ड्रॉइंग बनाएगा।

नानी हाथ-मुंह धोकर उसके लिए लीची छीलने के लिए बैठी ही थीं कि आयुष ने कहा, “नानी जब बेबी घर आएगा न और मेरी इतनी सारी ड्रॉइंग में अपनी फोटो देखेगा तो बहुत हैप्पी हो जाएगा।

फिर मैं रोज़ उसे अपने साथ पार्क में खेलने के लिए ले जाऊंगा और उसको अपनी बॉल दूंगा। अपने साथ स्कूल ले जाऊंगा। बिल्कुल नहीं मारूंगा।”

ऐसा लगता था जैसे आयुष भाई साहब ही सबसे बड़े अथॉरिटी हैं आने वाले बेबी के ऊपर। रागिनी की मां ने भी अपनी तैयारियां शुरू कर दी थीं। वो बच्चे के लिए ऊन के मोज़ें बुनने लग गई थीं। एक छोटा-सा पालना ख़रीद लिया था। और रागिनी के सामने बैठकर धार्मिक ग्रंथ पढ़ने लगी थीं।

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लेकिन आयुष ने पालने को रिजेक्ट कर दिया था। वो मोहित से ज़िद करके बंक बेड ख़रीदवा लाया था। कहता था की वो नीचे वाले बेड पर सोएगा और बेबी ऊपर वाले में।

मोहित अक्सर कमरे के एक कोने में बैठा चुपचाप बड़े चाव से आयुष की हरकतों को देखते रहता था और सोचता था की काश बड़े भी दुनिया को इसी मासूमियत और सरलता से देख पाते जैसे बच्चे देखते हैं।

रागिनी की गोद भराई की तैयारियां शुरू हो गई थीं। उनकी तरफ़ गोद-भराई बड़ी रस्म मानी जाती थी। प्रेगनेंसी के सातवें-आठवें महीने में होती है। जिसमे मां को ढेर सारे तोहफ़े और रिश्तेदार, दोस्त, पड़ोसी आशीर्वाद देने आते हैं।

यूं तो मोहित ने उससे कह रखा था की वो सबकुछ संभाल लेगा। पर रागिनी परफ़ेक्शनिस्ट थी। और सच कहूं तो उसे भरोसा नहीं था कि इतने बड़े फ़ंक्शन को उसका हस्बैंड अकेला ऑर्गेनाइज़ कर पाएगा।

रागिनी ने कहा, “मुझे ही कर लेने दो। दिन भर एक सोफ़े से बिस्तर और बिस्तर से सोफ़े के बीच पेंडुलम की तरह घूमती ही तो रहती हूं।” मुझे लगता है की गोद-भराई की तैयारियां एक बहाना ही रहा होगा।

रिश्तेदारों की उस फ़ौज से बचने के लिए जो धीरे-धीरे घर पर धावा बोलने की तैयारियां कर रही थी। मामियां और भाभियां। चाचियां और फूफियां। सब आने का मन बना रही थीं। इस बीच आयुष का बेबी पूरण ज़ोर-शोर से चालू था। अब तो उसके फ़्रेंड्स भी बच्चे के बारे में पूछने लग गए थे।

“आंटी आयुष को बुला दीजिए प्लीज़। आंटी बेबी घर कब आने वाला है? बेबी का नाम क्या है?” अरे नाम से याद आया कि नाम का महासंग्राम अभी ख़त्म नहीं हुआ था।

अगर लड़का होता, तो मोहित ने तीन नाम शॉर्टलिस्ट किए थे–अविरल, आदित, हिमांशु। रागिनी ने जवाब में शॉर्टलिस्ट किए थे-कुश, मलय, कौश्तुभ। अच्छा अगर लड़की होती तो मोहित ने अपना फ़ाइनल नाम एक ही सोच लिया था–आयशा। और रागिनी का फ़ैसला था की उनकी बेटी का नाम अदिति होगा।

इन आठ नामों की लड़ाई में बेचारा आयुष पिसा जा रहा था। न जाने कितनी बार वो पर्चियां उठा चुका था। न जाने कितनी बार वो आंखें बंद करके बड़ी-सी शीट पर कई नामों में से एक नाम पर ऊंगली रख चुका था।

लेकिन हर बार मियां-बीवी में कुछ न कुछ आरोप-प्रत्यारोप हो जाते थे। और फ़ैसला ख़ारिज हो जाता था। ये सब करते-करते गोद भराई का दिन भी आ गया। घर रिश्तेदारों से भरा था। औरतें ढोलक मंजीरे पर अपनी धुन में गाने लगी थीं। उधर अपने कमरे में रागिनी तैयार हो रही थी। साड़ी नहीं छांट पा रही थी, उलझ रही थी।

आख़िरकार तैयार होकर ड्रॉइंगरूम की ओर बढ़ी, मोहित को देखा। ख़ूबसूरत लेकिन बेहद थकी हुई लग रही थी। पिछले कुछ घंटों की किच-किच में उसका ब्लडप्रेशर बढ़ गया था। बेहोश होने लगी। एक दीवार के सहारे खड़ी हो गई। फ़ौरन रागिनी को अस्पताल ले जाने की जरूरत थी, वरना कुछ भी हो सकता था।

एम्बुलेंस वाले ड्राइवर से मोहित तीन बार कह चुका था, “भैया, जरा-सा तेज चलाइए।” नहीं सुन रहा था। आख़िरकार मोहित उस पर चिल्ला गया था। बदहवास था वो।

बस आधे घंटे पहले तक सबकुछ ठीक था। जैसे ज़िंदगी का साफ़-सुथरा फ्ऱेम। लेकिन अचानक किस्मत ने उसका शीशा चटका दिया था। रागिनी बेहोश थी और जवाब नहीं दे रही थी।

बड़ा अकेला महसूस कर रहा था वो अचानक। मोहित अफ़रा-तफ़री में अस्पताल पहुंचा। उसे समझ ही नहीं आ रहा था की रागिनी का ख़्याल करे या दौड़कर परचा बनवाए। ख़ैर डॉक्टर्स ने आख़िरकार रागिनी को एडमिट कर लिया।

मोहित जाकर उसके बेड के बग़ल में बैठ गया, उसका हाथ थाम लिया। पहली बार रागिनी के, इस बहादुर लड़की के चेहरे पर शिकन देखी थी। मां बनने का सपना वो बचपन से संजोए थी। ये सपना वो खोना नहीं चाहती थी।

मोहित ने रागिनी की ख़ातिर दफ़्तर से छुट्टी ली। दौड़ते हुए सब काम करता रहता था दिनभर। और उधर घर पर मां एक नन्हीं सी जान आयुष का ध्यान बंटा रही थीं। और प्रार्थना कर रही थी कि उसकी बेटी ठीक हो जाए। लेकिन रागिनी की हालत सुधर ही नहीं रही थी।

उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच एक दरीचा है और उस दरीचे से मोहित अपनी पत्नी की ज़िंदगी को देख रहा था। उसने तो सारी ज़िंदगी का सोचा-समझा प्लानर तैयार कर लिया था। कब शादी करेगा, कब पहला बच्चा होगा, कब दूसरा, कब उनके लिए फ़िक्स्ड डिपोज़िट

। लेकिन इस सोचे-समझे कैलेंडर में एक नया पन्ना कहीं से उड़कर आ गया था। एक दिन डॉक्टर ने कहा, “सॉरी हम डिलीवरी डेट तक वैट नहीं कर सकते हैं। हमें ऑपरेशन करके प्रीमेच्योर डिलीवरी करनी होगी।”

दो दिन बाद मरीजों वाली हरी ड्रेस पहनकर रागिनी अपने वार्ड से निकल गई। पहियों वाले स्ट्रेचर पर सवार होकर। अटेंडेंट उसे लंबे कॉरिडोर में लेकर चले। मोहित भी साथ ही चल रहा था। नास्तिक था पर आज किसी अनजाने इष्ट देवता को याद भी कर रहा था।

ऑपरेशन थिएटर के बाहर उससे रुकने को कहा गया। मोहित एक बैंच पर बैठ गया और इंतज़ार करने लगा। बहुत देर हो गई। दूसरे ऑपरेशन थिएटर में सर्जरी ख़त्म भी हो गई और पेशेंट बाहर भी आ गया।

मोहित बेचैन हो रहा था, अचानक डॉक्टर ऑपरेशन के बाद धुले हाथों को पोंछते हुए बाहर आया और कहा, “मि. मोहित।” मोहित अचानक खड़ा हो गया।

डॉक्टर ने कहा, “आपकी वाइफ़ एकदम ठीक हैं। लेकिन आपका बच्चा स्टिल बोर्न, बेजान पैदा हुआ है।” मोहित और रागिनी की ज़िंदगी का ख़ूबसूरत फ़ोटो फ्ऱेम ज़मीन पर गिरकर टुकड़े-टुकड़े हो गया था।

वो बच्चा जिसका उन्हें एक साल से इंतजार था, वो उनकी ज़िंदगी में आने से पहले ही उन्हें अलविदा कहकर चला गया था। ये बात सिर्फ़ रागिनी की मां को बताई गई।

रागिनी का प्राइवेट वार्ड दिनभर दोनों औरतों की सिसकियों से भरा रहता। मोहित के अंदर भी बहुत कुछ उमड़ रहा था, जैसे किसी ने तकलीफ़ में डूबा हुआ खंजर उसके सीने में डालकर हाथ को फिरा दिया हो।

वो भी ज़ोर-ज़ोर से सिसक-सिसककर रोना चाहता था, लेकिन मजबूर था। ऐसे वक़्त पर कमज़ोर नहीं दिख सकता था। घर पर आयुष को एक झूठ बता दिया गया था की उसकी मम्मी को एक इंफ़ेक्शन हो गया था और उसे किसी से भी मिलने की मनाही थी।

मोहित और रागिनी का अपना ग़म इतना तकलीफ़देह नहीं था, जितना उस लम्हे का डर, जब अपने घर में वापस दाखिल होने वाले थे। ख़ाली हाथ। वो दोनों जब घर से निकले थे, तो उस नन्हें से सपने को घर लाने के लिए निकले थे, जो एक साल से उनकी आंखों में बसा हुआ था।

लेकिन आज वो सपना जल चुका था। रागिनी को अस्पताल से घर जाने की इजाज़त मिलने वाली थी। लेकिन शायद कुछ वक़्त के लिए उसे किसी भी चीज़ का कोई मोह ही नहीं बचा था। वो टूट चुकी थी। दीवारों को ताकती रहती थी। अचानक रो पड़ती थी।

कुछ और दिन बीत गए।

आख़िरकार एक दिन रागिनी को डिस्चार्ज कर दिया गया। मोहित ने अस्पताल से चलने से पहले घर फ़ोन किया, आया ने उठाया। “आयुष कहां है मोहित ने कहा।” “ऐरोप्लेन बना हुआ है साब।” पीछे आयुष के ज़ोर-ज़ोर से गाने की आवाज़ें आ रही थीं।

वो हाथ हवा में फैलाकर हवाई जहाज बनकर सारे घर में गाता फिर रहा था–मेरे घर एक काका आने वाला है। मोहित ने बिना कुछ कहे फ़ोन रख दिया। पेपर वर्क पूरा हो गया था। वो लोग चल दिए।

आधे घंटे बाद मोहित ने अपने घर पर घंटी बजाई। आया ने दरवाज़ा खोला और पलटकर चिल्लाई, “आयुष देखो कौन आया है।”

आयुष दौड़ता हुआ आया, वही, ऐरोप्लेन वाली मुद्रा करता हुआ बोला, “कहां है बेबी? कहां है बेबी?” मोहित ने पलटकर रागिनी और उसकी मां को देखा। रागिनी बोली, “लो। ये है तुम्हारा बेबी।” रागिनी की गोद में एक छोटा-सा बच्चा था। पांव मारता हुआ, अपनी ज़रा-ज़रा सी मुट्ठियां भींचता हुआ।

अपनी आंखें खोलकर रौशनी में मींचता हुआ। रागिनी की बेटी उसे छोड़कर चली गई थी और आयुष की ख़ुशी की खातिर मोहित और रागिनी ने एक नन्हीं सी ज़िंदगी को एक नई ज़िंदगी देने का फ़ैसला कर लिया था, अनाथालय जाकर।

बस इतनी सी थी यह कहानी।

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All Credits Goes to Sir Neelesh Mishra G

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